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द्रोण पर्व
अध्याय १६८
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सञ्जय़ उवाच
स्वधर्मं नेच्छसे ज्ञातुं मिथ्या वचनमेव ते |  १४   क
भय़ार्दितानामस्माकं वाचा मर्माणि कृन्तसि ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति