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शान्ति पर्व
अध्याय १०५
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मुनिरु उवाच
असम्भवे श्रिय़ो राजन्हीनस्य सचिवादिभिः |  ५३   क
दैवे प्रतिनिविष्टे च किं श्रेय़ो मन्यते भवान् ||  ५३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति