आदि पर्व  अध्याय ६०

वैशम्पाय़न उवाच

शुकी विजज्ञे धर्मज्ञ शुकानेव मनस्विनी |  ५७   क
कल्याणगुणसम्पन्ना सर्वलक्षणपूजिता ||  ५७   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति