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वन पर्व
अध्याय ११९
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वैशम्पाय़न उवाच
जिते हि धर्मस्य सुते सभार्ये; सभ्रातृके सानुचरे निरस्ते |  २२   क
दुर्योधने चापि विवर्धमाने; कथं न सीदत्यवनिः सशैला ||  २२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति