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वन पर्व
अध्याय २८१
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मार्कण्डेय़ उवाच
ततोऽव्रवीत्तथा दृष्ट्वा भर्तारं शोककर्शितम् |  ९५   क
प्रमृज्याश्रूणि नेत्राभ्यां सावित्री धर्मचारिणी ||  ९५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति