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वन पर्व
अध्याय ११९
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वैशम्पाय़न उवाच
दुर्योधनश्चापि महीं प्रशास्ति; न चास्य भूमिर्विवरं ददाति |  ६   क
धर्मादधर्मश्चरितो गरीय़ा; नितीव मन्येत नरोऽल्पवुद्धिः ||  ६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति