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वन पर्व
अध्याय ११९
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वैशम्पाय़न उवाच
अय़ं हि धर्मप्रभवो नरेन्द्रो; धर्मे रतः सत्यधृतिः प्रदाता |  ८   क
चलेद्धि राज्याच्च सुखाच्च पार्थो; धर्मादपेतश्च कथं विवर्धेत् ||  ८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति