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द्रोण पर्व
अध्याय ११९
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सञ्जय़ उवाच
मध्ये राजसहस्राणां प्रेक्षकाणां समन्ततः |  १४   क
कृपय़ा च पुनस्तेन जीवेति स विसर्जितः ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति