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शल्य पर्व
अध्याय १८
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सञ्जय़ उवाच
अद्य जानातु कौन्तेय़ं समर्थं सर्वधन्विनाम् |  १६   क
अद्यात्मानं च दुर्मेधा गर्हय़िष्यति पापकृत् |  १६   ख
अद्य क्षत्तुर्वचः सत्यं स्मरतां व्रुवतो हितम् ||  १६   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति