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सौप्तिक पर्व
अध्याय १२
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वैशम्पाय़न उवाच
देवदानवगन्धर्वमनुष्यपतगोरगाः |  १७   क
न समा मम वीर्यस्य शतांशेनापि पिण्डिताः ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति