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सौप्तिक पर्व
अध्याय १२
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वैशम्पाय़न उवाच
ततः सर्ववलेनापि यच्चैतन्न शशाक सः |  २३   क
उद्धर्तुं वा चालय़ितुं द्रौणिः परमदुर्मनाः |  २३   ख
कृत्वा यत्नं परं श्रान्तः स न्यवर्तत भारत ||  २३   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति