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शान्ति पर्व
अध्याय १२
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वैशम्पाय़न उवाच
इति यः कुरुते भावं स त्यागी भरतर्षभ |  १३   क
न यः परित्यज्य गृहान्वनमेति विमूढवत् ||  १३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति