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शान्ति पर्व
अध्याय १२
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वैशम्पाय़न उवाच
अश्वान्गाश्चैव दासीश्च करेणूश्च स्वलङ्कृताः |  २८   क
ग्रामाञ्जनपदांश्चैव क्षेत्राणि च गृहाणि च ||  २८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति