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द्रोण पर्व
अध्याय ५१
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सञ्जय़ उवाच
अर्हते प्रातिवेश्याय़ श्राद्धं यो न ददाति च |  ३४   क
अनर्हते च यो दद्याद्वृषलीपत्युरेव च ||  ३४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति