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शान्ति पर्व
अध्याय १२
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वैशम्पाय़न उवाच
एतस्मिन्वर्तमानस्य विधौ विप्रनिषेविते |  ३४   क
व्राह्मणस्य महाराज नोच्छित्तिर्विद्यते क्वचित् ||  ३४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति