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द्रोण पर्व
अध्याय १६७
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सञ्जय़ उवाच
विशस्त्रकवचाश्चान्ये वाहनेभ्यः क्षितिं गताः |  १५   क
सञ्छिन्ना नेमिषु गता मृदिताश्च हय़द्विपैः ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति