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वन पर्व
अध्याय ६२
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वृहदश्व उवाच
स कदाचिद्वने वीरः कस्मिंश्चित्कारणान्तरे |  ३०   क
क्षुत्परीतः सुविमनास्तदप्येकं व्यसर्जय़त् ||  ३०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति