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वन पर्व
अध्याय १५८
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वैशम्पाय़न उवाच
ते पक्षिण इवोत्पत्य गिरेः शृङ्गं महाजवाः |  ३१   क
तस्थुस्तेषां समभ्याशे धनेश्वरपुरःसराः ||  ३१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति