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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १२
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वासुदेव उवाच
परमव्यक्तरूपस्य परं मुक्त्वा स्वकर्मभिः |  १२   क
यत्र नैव शरैः कार्यं न भृत्यैर्न च वन्धुभिः |  १२   ख
आत्मनैकेन योद्धव्यं तत्ते युद्धमुपस्थितम् ||  १२   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति