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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय १२
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धृतराष्ट्र उवाच
लव्धं प्रशमय़ेद्राजा निक्षिपेद्धनिनो नरान् |  १७   क
ज्ञात्वा स्वविषय़ं तं च सामादिभिरुपक्रमेत् ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति