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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय १२
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धृतराष्ट्र उवाच
सर्वथैव महाराज शरीरं धारय़ेदिह |  १८   क
प्रेत्येह चैव कर्तव्यमात्मनिःश्रेय़सं परम् ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति