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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय १२
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धृतराष्ट्र उवाच
अश्वमेधसहस्रेण यो यजेत्पृथिवीपतिः |  २३   क
पालय़ेद्वापि धर्मेण प्रजास्तुल्यं फलं लभेत् ||  २३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति