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वन पर्व
अध्याय १६२
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वैशम्पाय़न उवाच
तं तथादीनमनसं राजानं हर्षसम्प्लुतम् |  ११   क
उवाच वचनं धीमान्देवराजः पुरन्दरः ||  ११   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति