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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय १२
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धृतराष्ट्र उवाच
प्रय़ास्यमानो नृपतिस्त्रिविधं परिचिन्तय़ेत् |  ५   क
आत्मनश्चैव शत्रोश्च शक्तिं शास्त्रविशारदः ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति