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सभा पर्व
अध्याय १२
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वैशम्पाय़न उवाच
इत्येवं सुहृदः सर्वे पृथक्च सह चाव्रुवन् |  १६   क
स धर्म्यं पाण्डवस्तेषां वचः श्रुत्वा विशां पते |  १६   ख
धृष्टमिष्टं वरिष्ठं च जग्राह मनसारिहा ||  १६   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति