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कर्ण पर्व
अध्याय २८
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सञ्जय़ उवाच
वैश्यः किल समुद्रान्ते प्रभूतधनधान्यवान् |  ९   क
यज्वा दानपतिः क्षान्तः स्वकर्मस्थोऽभवच्छुचिः ||  ९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति