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सभा पर्व
अध्याय १२
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वैशम्पाय़न उवाच
तं विश्रान्तं शुभे देशे क्षणिनं कल्यमच्युतम् |  ३४   क
धर्मराजः समागम्य ज्ञापय़त्स्वं प्रय़ोजनम् ||  ३४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति