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द्रोण पर्व
अध्याय १७२
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व्यास उवाच
सर्वरूपं भवं ज्ञात्वा लिङ्गे योऽर्चय़ति प्रभुम् |  ८७   क
आत्मय़ोगाश्च तस्मिन्वै शास्त्रय़ोगाश्च शाश्वताः ||  ८७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति