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अनुशासन पर्व
अध्याय २८
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मतङ्ग उवाच
देवतासुरमर्त्येषु यत्पवित्रं परं स्मृतम् |  २८   क
चण्डालय़ोनौ जातेन न तत्प्राप्यं कथञ्चन ||  २८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति