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वन पर्व
अध्याय १२
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विदुर उवाच
स दृष्ट्वा पाण्डवान्दूरात्कृष्णाजिनसमावृतान् |  १५   क
आवृणोत्तद्वनद्वारं मैनाक इव पर्वतः ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति