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वन पर्व
अध्याय १९७
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मार्कण्डेय़ उवाच
तामवेक्ष्य ततः क्रुद्धः समपध्याय़त द्विजः |  ४   क
भृशं क्रोधाभिभूतेन वलाका सा निरीक्षिता ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति