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वन पर्व
अध्याय १२
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विदुर उवाच
असम्भ्रान्तं तु तद्रक्षः समरे प्रत्यदृश्यत |  ४४   क
चिक्षेप चोल्मुकं दीप्तमशनिं ज्वलितामिव ||  ४४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति