वन पर्व  अध्याय १२

विदुर उवाच

स भीमेन परामृष्टो दुर्वलो वलिना रणे |  ६०   क
व्यस्पन्दत यथाप्राणं विचकर्ष च पाण्डवम् ||  ६०   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति