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वन पर्व
अध्याय १२
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विदुर उवाच
समाश्वास्य च ते सर्वे द्रौपदीं भरतर्षभाः |  ७१   क
प्रहृष्टमनसः प्रीत्या प्रशशंसुर्वृकोदरम् ||  ७१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति