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वन पर्व
अध्याय १२
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वैशम्पाय़न उवाच
एवं विनिहतं सङ्ख्ये किर्मीरं राक्षसोत्तमम् |  ७५   क
श्रुत्वा ध्यानपरो राजा निशश्वासार्तवत्तदा ||  ७५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति