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वन पर्व
अध्याय १८८
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मार्कण्डेय़ उवाच
पानीय़ं भोजनं चैव याचमानास्तदाध्वगाः |  ८०   क
न लप्स्यन्ते निवासं च निरस्ताः पथि शेरते ||  ८०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति