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कर्ण पर्व
अध्याय ४९
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वासुदेव उवाच
तन्मानितः पार्थिवोऽय़ं सदैव; त्वय़ा सभीमेन तथा यमाभ्याम् |  ६६   क
वृद्धैश्च लोके पुरुषप्रवीरै; स्तस्यावमानं कलय़ा त्वं प्रय़ुङ्क्ष्व ||  ६६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति