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विराट पर्व
अध्याय १२
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वैशम्पाय़न उवाच
यदास्य तुल्यः पुरुषो न कश्चित्तत्र विद्यते |  २७   क
ततो व्याघ्रैश्च सिंहैश्च द्विरदैश्चाप्ययोधय़त् ||  २७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति