आश्रमवासिक पर्व  अध्याय २४

वैशम्पाय़न उवाच

गान्धारि परितुष्टोऽस्मि वध्वाः शुश्रूषणेन वै |  ८   क
तस्मात्त्वमेनां धर्मज्ञे समनुज्ञातुमर्हसि ||  ८   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति