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उद्योग पर्व
अध्याय १२
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वृहस्पतिरु उवाच
प्रमीय़ते चास्य प्रजा ह्यकाले; सदा विवासं पितरोऽस्य कुर्वते |  २१   क
भीतं प्रपन्नं प्रददाति शत्रवे; सेन्द्रा देवाः प्रहरन्त्यस्य वज्रम् ||  २१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति