उद्योग पर्व  अध्याय १२

शल्य उवाच

अथ देवास्तमेवाहुर्गुरुमङ्गिरसां वरम् |  २४   क
कथं सुनीतं तु भवेन्मन्त्रय़स्व वृहस्पते ||  २४   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति