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सौप्तिक पर्व
अध्याय ८
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सञ्जय़ उवाच
ये त्वजाग्रत कौरव्य तेऽपि शव्देन मोहिताः |  ४२   क
निरीक्ष्यमाणा अन्योन्यं द्रौणिं दृष्ट्वा प्रविव्यथुः ||  ४२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति