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भीष्म पर्व
अध्याय ५८
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सञ्जय़ उवाच
एकप्रहाराभिहतान्भीमसेनेन कुञ्जरान् |  ४६   क
अपश्याम रणे तस्मिन्गिरीन्वज्रहतानिव ||  ४६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति