द्रोण पर्व  अध्याय ६१

धृतराष्ट्र उवाच

यद्वृत्तं तात सङ्ग्रामे मन्दस्यापनय़ैर्भृशम् |  ५०   क
लोभानुगतदुर्वुद्धेः क्रोधेन विकृतात्मनः ||  ५०   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति