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भीष्म पर्व
अध्याय ११०
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सञ्जय़ उवाच
सुशर्माणं कृपं चैव त्रिभिस्त्रिभिरविध्यत |  २   क
प्राग्ज्योतिषं च समरे सैन्धवं च जय़द्रथम् ||  २   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति