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कर्ण पर्व
अध्याय १२
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सञ्जय़ उवाच
कर्णाभ्यां शिरसोऽङ्गेभ्यो लोमवर्त्मभ्य एव च |  ३१   क
रथध्वजेभ्यश्च शरा निष्पेतुर्व्रह्मवादिनः ||  ३१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति