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कर्ण पर्व
अध्याय १२
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सञ्जय़ उवाच
ततः समभवद्युद्धं शुक्राङ्गिरसवर्चसोः |  ४८   क
नक्षत्रमभितो व्योम्नि शुक्राङ्गिरसय़ोरिव ||  ४८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति