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शल्य पर्व
अध्याय २७
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सञ्जय़ उवाच
यत्तदा हृष्यसे मूढ ग्लहन्नक्षैः सभातले |  ४७   क
फलमद्य प्रपद्यस्व कर्मणस्तस्य दुर्मते ||  ४७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति