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कर्ण पर्व
अध्याय ६१
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सञ्जय़ उवाच
एवं व्रुवाणं पुनराद्रवन्त; मास्वाद्य वल्गन्तमतिप्रहृष्टम् |  ८   क
ये भीमसेनं ददृशुस्तदानीं; भय़ेन तेऽपि व्यथिता निपेतुः ||  ८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति