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कर्ण पर्व
अध्याय १२
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सञ्जय़ उवाच
तेषु प्ररुग्णेषु गुरोस्तनूजं; वाणैः किरीटी नवसूर्यवर्णैः |  ६१   क
प्रच्छादय़ामास महाभ्रजालै; र्वाय़ुः समुद्युक्तमिवांशुमन्तम् ||  ६१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति